Dr Toomuch Coolkarni’s concern

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Dr Toomuch Coolkarni is a very ‘learned’ therefore ‘intellectual’ person and “eminent”personality who is very much “concerned” about the social evils of society. Dr saab believes that every issue should be well discussed prior to implementation. He also believes that no issue is without loopholes and its upon one’s intellectual talent that he point out that. Being a writer, its his inborn right to do finger in every issue.

once a poor person came to him at his house. He was a poor and wanted some work for his ‘food of the day’….. lets have a window look to find out what is going on there.
मजदूर -“साहब आपके घर की सफाई कर दू?”
डॉ – कौन हो तुम?
मजदूर- साहब मै यही काम करता हू पास वाली बिल्डिंग में जो बन रही है…. आज मालिक आये नहीं तो सोचा कुछ और काम कर लू? पुचा तो पता चला की आपके यहाँ सफाई करने वाली घर गयी है. इसलिए चला आया.

Dr- “क्यों?क्यों सफाई करना चाहते हो?? whats your motive behind it?
मजदूर  -“साहब बहुत भूख लगी है.तो आप….”
Dr- ओह्ह!!! you mean hunger. i remember once i have written an article on “indian dispora and its contribution in food security of India”. very popular article it was. very popular. any ways..
मजदूर   -“साहब सफाई कर देता हू …कुछ पैसे दे दीजियेगा. कुछ खरीद के खा लूँगा.
Dr-“I knew it. Money motive. Capitalist mentality. But gentleman i warn you. Capitalism ज्यादे दिन तक नहीं चलने वाला. greedy businessman.”
मजदूर  – “साहब हमको समझ नहीं आ रहा आप क्या कह रहे है. हम तो कह रहे थे की आपका घर गन्दा दिख रहा है, साफ़ कर देते है. बदले में कुछ …..”
Dr- “सफाई?? you know 60% people of India cant access sanitation and drinking water. 90% slums areas are devoide of proper toilet.
मजदूर  – “उम्म्म !!जी.”
Dr – “What ji?? कितना साफाई करोगे??? How much effective is your effort whould be? give me the exact data!
मजदूर  – “माने साहब??
Dr-“माने की तुम्हारे इस effort से यानी सफाई से देश में कितना बदलाव आएगा??
मजदूर – “साहब बदलाव की क्या बात है. आपका घर साफ़ हो जाएगा. और क्या?
Dr- “no no gentleman. you are not getting me. तुम्हारे पास कोई सफाई का comprehensive plan है? एक घर की सफाई से कुछ नहीं होने वाला. कल फिर गन्दा होगा. listen carefully …always remember…..whatever you do should be long-lasting and well thought. only then it would be executed.
मजदूर  – :अब साहब पता नहीं आप क्या क्या बोले जा रहे है मुझे समझ में नहीं आ रहा.
Dr- “”तुम समझ नहीं रहे हो क्योकि तुम समझना नहीं चाहते. इस देश की problem यही है की यहाँ कोई समझना नहीं चाहता. Typical Indian Mentality.”
मजदूर  -“नहीं साहब ऐसी बात नहीं है. हम ज्यादे पढ़े लिखे नहीं है न!”
Dr – “Thats राईट. I remember I have delivered a lecture in IIT-Delhi on “current senerio of education system” in wchich i have pointed out that poor people are not educated because they dont have will to बे educated.” साक्षरता और शिक्षित होने में फर्क है.
मजदूर  – “सही है साहब. लेकिन इसका मतलब क्या हुआ?
Dr- मतलब ये हुआ की तुम पढ़े लिखे नहीं हो क्युकी तुम पढ़ना नहीं चाहते.
मजदूर – “ऐसा नहीं है साहब. माँ बाप बहुत गरीब थे हमारे. उस टाइम तो हम लोगो को कुछ पता नहीं था पढाई लिखाई के बारे तो …
Dr – “गरीबी….u mean Poverty….recently in a very eminent newspaper i have written an editorial on “Poverty on…”
मजदूर :- ऐ साहब…हमका माफ कर दीजिए…बहुत बड़ी गलती हो गयी हमसे जो आपके घर का सफाई करने का सोंचे….हम भूखे रह जायेंगे लेकिन अब कभी कुछ ‘करने’ का नहीं सोचेंगे.
Dr- “अरे!! कहाँ जा रहे हो?? सुनो….”
[गरीब आदमी बेचारा भागे जा रहा था….]
डा० साहब मन ही मन बुदबुदाये…”escapist behaviour. कुछ नहीं हो सकता इस देश का. लोग सीखना ही नहीं चाहते. I will write an article about this….”

Dr Coolkarni strait-way went to his table and started writing on the issue “why people are like this?”
believing once these ‘non-educated’ people will ‘read’ the article, they will not be like this.
[pics used are symbolic and stolen from the net with the help of Google]
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शब्दों की दुनिया पहचाने!!

अगर हिंगलिश[हिंदी+इंग्लिश] पे आपत्ति है तो हुर्दु [हिदी+उर्दू] पे क्यों नहीं??

भाषा एक माध्यम होता है. अपनी बात कहने का. लेकिन सिर्फ कहना ही काफी नहीं. ये भी जरुरी है की जो बात कही गयी है वो सुनी गयी हो और सबसे ऊपर, समझी गयी हो. और यही नहीं, आपकी बात ठीक उसी तरह से समझी गयी हो जैसे आपने समझाना चाहा है.

इसके लिए जरुरी है शब्दों का सही चुनाव. शब्द (चाहे इंग्लिश, उर्दू या हिंदी किसी के भी हो) अपने आप में मुकम्मल होते है. शब्दों को स्वयं पता होता है की उन्हें किस चीज, व्यक्ति या घटना को व्यक्त करना है. हमें उनकी इसी जानकारी का पता लगाना होता है. जाहिर सी बात है की एक शब्द किसी एक देश, काल परिस्थिति में किसी एक चीज़, घटना या व्यक्ति को ही व्यक्त करता है, जिसे दूसरा शब्द उतने मुकम्मल तरीके से नहीं नहीं व्यक्त कर सकता. यहाँ तक की पर्यायवाची शब्द भी अलग अलग देश काल परिस्थितियों के लिए बने है.

यहाँ मुकम्मल होने का मेरा अर्थ उन शब्दों से है जो भाषा के प्रवाह को सुगम बनाते है. सही शब्दों का चुनाव भाषा को इतना सरल बना देता है जैसे आपकी बात सीधे सामने वाले के जेहन में उतर गयी हो. यही शब्द अगर सही न हो तो वो इस प्रवाह के रास्ते में कंकड़ का काम करते है. प्रवाह को बाधित करते है.

ठीक ऐसे ही प्रत्येक भाषाओ में कुछ ऐसे शब्द होते है जिन्हें दूसरी भाषा के शब्द रिप्लेस नहीं कर पाते. वो खुद में मुकम्मल होते है. उन्हें रिप्लेस करना अगर अर्थ न भी बदले तो भाव जरुर बदल देगा. कहने का तरीका, लहजा बदल देगा. जैसे जावेद अख्तर साहब कहते है- गब्बर का किरदार अपने शब्द स्वयं चुनता था. क्योकि शब्द अगर मुकम्मल नहीं होते तो वो किरदार बदल देते. या फिर किरदार को समझने नहीं देते. उदहारण के तौर पर जब गब्बर, ठाकुर का हाथ काट देता है तो वो कहता है,”कैसे फडफडा रहा है साला”. वो ये भी कह सकता था,”देखो कैसे झटके मार रहा है” लेकिन अर्थ न बदलते हुए भी मायने बदल जाते, वो किरदार बदल जाता, उसकी फितरत बदल जाती. फडफडाना शब्द परिंदों के लिए प्रयोग लाते है. लेकिन उसका इस सिचुअसन में प्रयोग बिलकुल मुकम्मल है.

हर शब्द की अपनी दुनिया है. जो उसके अर्थ, उसके भाव, किरदार को व्यक्त करने की दशा और दिशा, कोई विशेष घटना इत्यादि से मिलकर बनी होती है. किसी शब्द की दुनिया में कोई दूसरा शब्द नहीं घुस सकता. मुकम्मल अभिव्यक्ति सहज अभिव्यक्ति होती है. और सहजता से ही शब्दों की अपनी दुनिया को खोज निकला जा सकता है.

कुल मिलाकर कहने का मतलब ये है की अभिव्यक्ति के दौरान हमें भाषाओ की सरहदे नहीं देखनी चाहिए. अगर मुकम्मल शब्द सरहद के उस पार है तो भी हिचकिचाना कैसा? और वैसे भी ये सरहदे देश की सरहदे जैसी बना दी गयी है जो अपने आप में सही नहीं. मायने ये नहीं रखता की कौन सी सरहद के उस पार से शब्द लाये गए है. मायने तो ये रखता है की मुकम्मल अभिव्यक्ति हो रही है या नहीं. और बात सिर्फ साहित्य की न होकर लोक-जीवन की हो, तो ये मायने रखना अपने आप में बहुत मायने नहीं रखता.

यही वजह है की हिंगलिश और हुर्दु इतने सहज तरीके से अस्तित्व में आ गयी. जैसा की अशोक चक्रधर जी कहते है. ” भाषा कोई जड़ तालाब का पानी नहीं है वो तो दरिया है जिसमें न जाने कितने नदी, नाले आकर मिलते हैं. दिशा तो समाज निर्धारित करेगा. नई पीढ़ी निर्धारित करेगी. साहित्य की भाषा परिनिष्ठित, शुद्ध होती है, लेकिन लोक-जीवन की भाषा में दूसरी भाषाओं के शब्द, लोकभाषाओं के शब्द आसानी से घुलते-मिलते रहते हैं .शुद्धतावादियों से मेरी कोई अनबन नहीं है. लेकिन इतना उनसे जरुर कहना चाहता हूं कि वह शुद्धतावाद किसी प्रकार के क्रुद्धतावाद में न बदले.”

[मेरे इस लेख में ही कई जगहों पर शब्दों का चुनाव सही नहीं हुआ होगा.इसकी  एकमात्र वजह है भाषाओ का समुचित ज्ञान न होना. इसलिए पाठकों से उम्मीद है की वो मेरी इस कमी को मुझ तक पहुचायेंगे. और इस लेख से जुड़े अपने ज्ञान भी हमसे बांटेगे. बस प्रयास है शब्दों को उनके वास्तविक अभिव्यक्ति में पहचानना. आईये शब्दों को ढूंढे जो खुद में मुकम्मल है. उनके किरदारों, परिस्थितिओं और घटनाओं को ढूंढे. आईये उनकी दुनिया ढूंढे]

o lala o la la geet ka sufiyana version !!

कई बार  सुनने के बाद  इस गाने का सूफियाना रहस्य समझ आया. पहले और निर्बुद्धियो की तरह मुझे भी यह गीत वल्गर लगा था, किन्तु जब मैंने गाने को ध्यान से ‘देखा’ तब मुझे इसके गीत के ‘बोलो’ का रहस्य समझ में आया. वास्तव में ये गीत द्विअर्थी है. जिसका दूसरा अर्थ सूफियाना है. ये गीत नश्वर शरीर में कैद आत्मा और परमात्मा के मध्य संवाद के रूप में है. देखिये  कैसे-

Aha oo oo…..


ये इश्वर से जुड़ने का पहला संबोधन है

Sshh chutki jo tune kaati hai
Jori se kaati hai, yahan wahan


हे इश्वर !ये चुटकी रूपी ज्ञान के चोट से जो तुमने मेरे मनः मस्तिष्क में यहाँ वहाँ जो ज्ञान का संचार किया है, उसकी मै आभारी हू. ये चोट इतनी जोर से थी की अज्ञानता से बंद मेरे मस्तिष्क के कपाट के  द्वार सहसा खुल गए.

Roothi hoon, main tujhse roothi hoon

Mujhe mana le na o jaan-e-jaan

हे इश्वर!! अज्ञानता से मेरी बुद्दि इतनी कुंद हो चुकी थी की मेरी आत्मा ही म्मुझ्से रूठ गयी थी. अब इस ज्ञान के प्रकाश से मै इसे मनाऊँगी. ये आत्मा ही मेरी जान है, यहीं से मेरा जहान है ये अब मै समझ चुकी हूँ.

इश्वर कहते है-

Chedenge hum tujhko
Ladki tu hai badi bumbaat
Aha aha aha aha


छेड़ेंगे हम तुमको…अर्थात, तुम अज्ञान में रहो ये हम नहीं देख सकते. इसलिए समय समय पे हम तुम्हे ज्ञान रूपी उंगलियों से अज्ञानता के इस शरीर को छेड़ते रहेंगे. तुम बुम्बाट हो! यानी तुम ब्रह्म से बात कर सकने में सक्षम हो. और एक बार जब ब्रह्म का अहसास तुम्हे होगा तो तुम्हारी आत्मा अहा कर उठेगी.(वो भी चार बार)

Ooh la la, ooh la la, ooh la la, ooh la la
Tu hai meri fantasy


(यहाँ कवी सेकुलर हो गया है)….ओ अल्लाह!! ओ अल्लाह!! तुम ही मेरे जीवन की एक मात्र फंतासी हो…

Choo na na, choo na na, choo na na, choo na na
Ab main jawan ho gayi


मेरी आत्मा अब जवान हो चुकी है. अब ज्ञान रूपी ऊँगली ना करिये प्रभु!

Chua jo tune toh dil ne maari seeti
De de inn gaalon pe ek pappi meethi meethi
Yowan tera, saavan bhara
Bheeg gaya dil yeh mera


हे पुत्री! जब ज्ञान आत्मा को छूता है तो ह्रदय से सिटी रूपी ध्वनि निकल जाती है. हे अज्ञानी, आ, आगे बढ़ और ले ले इस नश्वर गाल पे ज्ञान का चुम्बन. और भर दे अपने यौवन को ज्ञान से. चुम्बन के बारिश की बूंदों से मेरा ह्रदय भी द्रवित कर दिया तुने!

Aaha tune hi barsaat karaayi
Kya kare yeh yowan bechara bechara bechara


नहीं नहीं प्रभु! ये बरसात तो आपकी ही दें है. कहा मै इस संसार रूपी मरुस्थल में पड़ी हुई अज्ञानता की मरीचिका की खोज में थी. और आपने ज्ञान की बारिश कर मेरे यौवन के ज्ञान की प्यास को बुझा दिया.
Ooh la la, ooh la la, ooh la la, ooh la la
Tu hai meri fantasy


ओ अल्लाह!! ओ अल्लाह!! तुम ही मेरे जीवन की एक मात्र फंतासी हो…

Gira ke apna pallu, ba re ba
Kar deti woh humo bekaraar

इश्वर कहते है, हे पुत्री, ये ज्ञान पे पड़े परदे को इस तरह बार बार ना गिराओ. ये पल्लू बार बार गिराने से काम नहीं चलेगा..एक ही बार गिरा दो. जैसे ही पल्लू इस नश्वर शरीर से गिरता है, मेरे अंदर भी एक उर्जा का संचार हो जाता है. जिससे मुझे तुम्हे ज्ञान से भर देने की इच्छा बलवती हो जाती है.

Aag lagayi tune tann mein kya kare yeh pallu bechara
Bechara, bechara, aa aa


आपके इच्छाओं  की जठर अग्नि से ही तो ये पल्लू बार बार गिर जाता है. इसमें मेरा क्या कसूर प्रभु!!
इसलिए हे प्रभु! मुझे अपने ज्ञान के आगोश में ले लो!! अब और अज्ञानता की इस पीड़ा से मुझे मुक्त करो!!!

2011 in review

The WordPress.com stats helper monkeys prepared a 2011 annual report for this blog.

Here’s an excerpt:

A San Francisco cable car holds 60 people. This blog was viewed about 1,200 times in 2011. If it were a cable car, it would take about 20 trips to carry that many people.

Click here to see the complete report.

Expectation verses Acceptance !!!

“when relation starts with ‘expectations’ it ends with loneliness….and when it starts with ‘acceptance’ it rests on the existence!!”

ये Portrayal है मेरे प्यार का.जब मैंने प्यार किया था. और कुछ दिनों बाद मैंने भी कुछ images बनाने शुरू कर दिए थे. की उसे कैसा होना चाहिए!! जैसे हम इमारते बनाते है. वैसे ही उसके images से ईमारत बनायीं मैंने…..अपनी उम्मीदों की ईंट से, समाज की इच्छाओ के सीमेंट से उन ईंटो को जोड़ा. और फ़िर बन गयी मेरी बिल्डिंग.जिसमे एक नया ही किरदार रच दिया था मैंने.बिलकुल अलग उससे. कितनी अच्छी थी वो मेरी रचना.फ़िर मैंने उस किरदार के लिए एक दुनिया रची….उन्ही ईंट और सीमेंट से. एक अलग जादुई दुनिया. जिसमे सब कुछ परफेक्ट था.

लेकिन जैसे ही मैंने सचाई में उसे देखा. वो अलग लगने लगी मुझे. कितनी दूर थी वो.मेरी दुनिया से अलग थी वो. उस किरदार जैसी तो बिलकुल भी नहीं जिससे मै प्यार करता था. वो बदल गयी थी. वो बिलकुल भी वैसी नहीं थी जैसा मेरा किरदार था.इसलिए मैं उस किरदार को उसकी शक्ल देने की कोशिश करने लगा.पुरजोर कोशिश.बहोत कोशिश की मैंने उसे उस दुनिया में लाने की. लेकिन वो नहीं मानी. ……………………और चली गयी.

मै अकेला रह गया था इस दुनिया में. मै अकेला अपनी उम्मीद के साथ, समाज की इक्छाओ के साथ. और अपनी बनायीं हुई ईमारत के साथ. और फ़िर अचानक एक दिन मुझे एहसास हुआ की वो अपने साथ एक और चीज़ लेते गयी है. मेरे ईमारत की “नीव”.

खयालो की दुनिया अलग होती है. पहले हम नीव बनाते है उस पर ईमारत खड़ी करते है. यहाँ इमारते पहले बनती है.मैंने भी यही किया था  अपने हिसाब से.जैसा मै ‘चाहता’ था. मै भूल गया था की जो कुछ भी मैंने बनाया है उसकी नीव वो ही है. जब भी मै कुछ सोचता था उसकी शुरुवात उसी से होती थी. लेकिन खत्म होते होते वो ही कही खो जाती था. मेरे desires खत्म कर देते थे उसे. मेरी उम्मीदे खत्म कर देती थी. और मेरे उस सोच के सफर में मेरी उम्मीदों से लड़ते लड़ते वो रास्ते में ही कही खो जाती था….वापस लौट जाती  थी. और मै चलता चला जाता था अपनी उम्मीदों, अपनी चाहतो के साथ. और मै उसे खोता जा रहा था. मेरी ईमारत अपनी नीव खोती जा रही थी.

और अब मै समझ सकता था की मेरा बनाया हुआ किरदार कितना खोखला है. मै कितना खोखला हू!!!

फ़िर एक दिन मै रुका. कुछ समझा. सच को जाना. अपनी गलतियों को महसूस किया.

और मैंने फ़िर से दुनिया बनायीं. लेकिन अब ये दुनिया उस किरदार से नहीं निकली थी. ये दुनिया उसके अंदर की ही थी. मैंने उसको ढूँढना शुरू किया उसके अंदर. उसे जानना शुरू किया. उसकी दुनिया में. फ़िर उसे ढूंढते ढूंढते एक दिन खुद को पाया. फ़िर एक दिन उसी दुनिया में हमारा प्यार भी एक चौराहे पे खड़ा हुआ मिला.जो शायद समझ नहीं पा रहा था की किस रास्ते उसे जाना है. हमने उसे अपने साथ ले लिया.  उसकी ही दुनिया में हमने हमारे रिश्ते को ढूंढा. एक नयी दुनिया मिली मुझे उसमे. फ़िर हमने और ढूंढा. वो कहते है ना, “Humans are made of possibilities”. हमने  वो possibilities ढूंढी उसमे. हमने वो possibilities एक एक करके achieve करनी शुरू की. और फ़िर हमें ऐसा लगा जैसे उसकी दुनिया उसकी है ही नहीं!!वो हमारी है!! मुझे पता ही नहीं चला कब मेरी दुनिया उसकी हो चली थी. कब हमारी दुनिया एक हो गयी थी. कब हम एक हो चुके थे. और कब मेरी उम्मीदे बदल चुकी थी. We are not found here in this new world but exist!!! And finally we are on the way to achieve all our possibilities to prove our existence better!

{ये रचना असत्य घटना पे आधारित है. इसका लेखक के वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है. जो भी सम्बन्ध है वो काल्पनिक जीवन से ही है.}

स्वामी और कन्या 2: ‘प्रेम’ की चीर फाड़!!!”


एक बार फिर सुनिए कन्या और स्वामी के मध्य हुए चैट वार्तालाप के कुछ अंश. आज का विषय है “प्रेम”.

स्वामी:  (खुद में ही गुनगुनाने की अवस्था में बुदबुदाते हुए)

हो ?

नहीं  हो ?

क्यों  नहीं  हो ?

हो  तो क्यों  हो ?

होना  क्या  है ?

नहीं  होना  क्या  है ?

होना  और  नहीं  होना  , होने  या  नहीं  होने  से  कैसे  अलग  है ?

जो  है वही  है या जो नहीं है वो भी  है .

या …..

(तभी का कन्या का key board आगमन होता है.)

कन्या : प्रभु…ये क्या है…

स्वामी: टाइम पास!!

कन्या: क्यों कर रहे है…देखिये मै आ गयी…

स्वामी : अब  तो  देर  हो  चुकी  है  कन्या

कन्या : ऐसे  न  कहिये  स्वामी …… बहुत देर से नयन  बिछाए  राह  देख  रही  थी.

स्वामी : अब तो कह  दिया .

कन्या : स्वामी  वचन  वापस  ले  लीजिये

स्वामी : Arrow and Talk…..में  कभी  reverse gear नहीं  लगता  कन्या

कन्या : हेहेहे …

स्वामी : दांत  न  दिखाओ..

कन्या : तो  स्वामी  मधुर  और  प्रेम  वचन  तो  कह  सकते  हैं

स्वामी : प्रेम !!!!! (आश्चर्य का ठिकाना तो रहा, लेकिन रहने न दिया)

कन्या :  हाँ

स्वामी : संज्ञा  तक  ही  ठीक  है ये . क्रिया  तो बिलकुल  नहीं

कन्या : स्वामी

स्वामी : कन्या

कन्या : ऐसा  न  कहिये

स्वामी : कह  दिया

कन्या : प्रेम जीवन  का आधार  है  

स्वामी : प्रेम विपासना  है, वासना है……..वाह !!

(और अपने बैठाए तुकांत पे मुग्ध हो गए)

कन्या : नहीं  स्वामी

स्वामी : हा  कन्या

कन्या : मैं  यह  स्वीकारती  हूँ  की  मेरे  प्रेम  में  स्वार्थ  है  थोडा

स्वार्थ  आपको  पाने  का  आपके   समीप  होने  का

किन्तु  येही  प्रेम  है जो

मेरे  जीवन  का  आधार  है

स्वामी: ये आधार निराधार है

कन्या:ये मेरे  होने  का  कारन  है .

स्वामी : तुम्हारे  होने  का  कारन  तुम्हारे  माँ  बाप  है . इसका  श्रेय उनसे ना छिनो.

कन्या : ….और  उनके  बीच  का  प्रेम

तो  हुआ  न  प्रेम  मेरे  होने  का  कारन

स्वामी : नहीं  सम्भोग …

छी छी छी !!!

क्या  कहलवा  दिया  तुमने

कन्या : प्रभु  उसके  होने  की  वजह  भी  तो

प्रेम  है

स्वामी : नहीं …उन्माद  है

कन्या :  उन्माद ..

स्वामी : हा क्षणिक  शारीरिक  उन्माद

कन्या : प्रभु

स्वामी :  बालिके

कन्या : मेरे जन्म  का कारण आप  के  हिसाब  से  भले  ही  उन्माद  हो

किन्तु  आज  मेरे इस  जगह,  जहाँ  हूँ

मैं  उसका  कारन  प्रेम  के  अलावा  कुछ  भी  नहीं  मानती

और  आज के बाद  जो  भी  बनू  उसका  आधार  भी  प्रेम  होगा

हर  इक  मानव  के  अस्तित्व  में  प्रेम  की  मुख्य  भूमिका  है.

स्वामी : जहा  जहा  प्रेम  की  मुख्य भूमिका होती  है वहाँ वहाँ मूर्खता की पृष्ठ भूमिका है..

कहाँ फ़स गयी  हो प्रेम के झंझावातो  में …

कन्या : प्रभु  मेरे  लिए  जीवन  के मायने  प्रेम से अलग हो ही नहीं सकते

सुख  का आधार प्रेम है

आनंद  का आधार  प्रेम  है

प्रेम की परिभाषा  ही अलग है

और जिस  परिभाषा के अंतर्गत  हम  बात  कर  रहे हैं अभी

वो  इक  बहुत  छोटा  और  नश्वर  अंग  है  प्रेम का ‘

स्वामी : आनंद  का  आधार  प्रेम  नहीं ….मोक्ष  है

कन्या :  मोक्ष क्या ?

स्वामी : हाहाहा (ऐसे खुश हुए जैसे अज्ञानता का ऐसा अद्भुत उदहारण देखा ही न हो)

जो  कन्या  प्रेम  के  जंजालो  में फसी रहेगी  …

वो  मोक्ष  को  कैसे  जान  पायेगी ?

अगर  प्रेम  ही  करना  है  तो …इश्वर  से  करो …

उसे  अपना  Boyfriend बनाओ

कन्या : इश्वर  कहाँ  हैं

और  अगर  इश्वर  हर  वस्तु  हर मानव में हैं तो  उसी  मानव  से  प्रेम  कर  रही  हूँ

अर्थात

इश्वर  से  प्रेम  कर  रही  हूँ

प्रेम  भाव  है

इश्वर  भाव  है

वो  भाव जो सर्वापी  है

और जो इश्वर सर्व-व्यापी  है

वो उस  मनुष्य  में भी है

जिससे  प्रेम है मुझे

कहाँ  मैं इश्वर से प्रेम नहीं कर रही ?

स्वामी : हर  चीज़  में  जीवन  है  इसका  कत्तई  ये  मतलब  नहीं  की  हर  चीज़  ही  जीवन  है

(फिर एक बढ़िया और अप्रासंगिक आंग्ल उदाहरण पेश करते है..)

Every human has mother that doesn’t mean humanity has mother

पाया ???

I mean….got?

कन्या : स्वामी ….

स्वामी : और अगर  सभी  में  इश्वर  है .. तो  किसी  और  को  पकड़  लो

उसमे  भी  इश्वर  होगा ..

कन्या : मुझे  इश्वर  का  ये ही रूप  पसंद  है

स्वामी :  (अपनी भृकुटियो को सिकोड़ते हुए) निर्बोध !!!

कन्या : सबका  अपना इश्वर है और   सबका इश्वर एक है

स्वामी : इश्वर का क्या रूप  है रे ???

मै कौन  होता  हु  उसे  अपने  रूप  में जकड़ने  वाला ?

(फिर खुद पे ही मुग्ध होते हुए…)

मै कौन होता हू उस निराकार को आकार देने वाला??

कन्या : अभी  तो  इश्वर का मेरे  लिए आप है…

स्वामी : इश्वर  कोई  प्लाट  है जो  सबका  अपना  अपना  है ?

नहीं !!

इश्वर  एक  है

सत्यमेव  जयते

सॉरी ..

सबका  मालिक  एक  है

कन्या : और  मेरे  मालिक  आप

स्वामी : मै तो खुद  नौकर  हूँ.

उस  इश्वर  का

वो  ही  सत्य है

वो  ही  परम  सत्य  है

वो  ही …

(फिर कुछ याद ही नहीं आता उन्हें )

जो है वो ही है.

कन्या : उसी को पा  रही  हूँ

स्वामी : किन्तु  मार्ग  तो  गलत  है  न

कन्या: कृष्ण  या राम  इश्वर नहीं थे?

उसने  जुडी  हुई  अराधना  ही  इश्वर  है

कन्या : मूर्ति  में  शक्ति  नहीं  होती

स्वामी : अगर सही  सीमेंट  न प्रयोग करो तो..

कन्या:शक्ति तो आस्था  में  होती  है 

स्वामी : बिलकुल

कन्या : वो ही  इश्वर  है

मेरी  आस्था आप में है

आप  ही  इश्वर  हो  मेरे

क्यूंकि  मेरी  आस्था  उस  इश्वर  में  है  जो  सर्वत्र  है

जो सब  में  है

स्वामी : confuse मत  करो …

कन्या : और उसी इक रूप में मेरी आस्था  है

स्वामी : सबसे पहले  तो अपनी आस्था  को  एक  जगह settle करो

कन्या : वो  इक  ही  जगह  है

आप  में

आप में ही में मेरा इश्वर है

स्वामी : ये  पाप  है …ये गलत है….illegal encroachment है यह

कन्या : अब  का  करेंगे  स्वामी

आपको  अभी  सत्य  का  ज्ञान  जो  नहीं  था .  मैंने  करवाया  है

स्वामी : ये  आपका  भ्रम  है

कन्या : और  वैसे  भी  किसी  को, क्या  पाप  है  और  क्या  पुण्य है, का  निर्णय  लेने  का  कोई  अधिकार  नहीं  है   न  ही  शक्ति  है .

भ्रम में तो हम सब है

किसी  का  सत्य  किसी और का भ्रम है..

स्वामी : जिस  एक  स्वरुप  में  आपकी  आस्था  है , उसको  कोई  रूप  देना  उसके  रूप  ने  दाग  लगाना  है …

ब्रह्म  का  क्या  रूप  है ?

जिस  प्रकार  रेगिस्तान  में  मरीचिका  देख  लोग  पानी  समझ  बैठते  है …

ठीक  उसी  प्रकार  तुम  उस  एक  ब्रह्म  का  रूप  मेरे  अंदर  देख  रही  हो …

मेरा  सहारा  लेने  की  क्या  आवश्यकता  है ?

Direct  contact करो इश्वर से.

कन्या : क्यूँ ?…क्यूंकि  दूर  से दोनों  इक  जैसे  लगते  हैं  …. अंतर  उसी को पता चलता  है जो प्यासा  होता  है  और  वहां  तक  जाता  है  किन्तु …जिसे  प्यास  नहीं लगी  हो ..कई  बार  वो  पानी  भी मरीचिका  समझ  कर  छोड़  देता  है

और  जीव  हूँ  स्वामी  ..भ्रम का स्वरुप हो सकता  है की समझ में न आये

मैं  अपनी  श्रद्धा और आस्था से ही उन्हें पाना  चाहती  हूँ

ज्ञान  से  कोशिश  करू  तो  शायद  बहुत  वक़्त  लग  जाये

ज्ञान  तार्किक  होता  है

कित्नु  प्रेम

भक्ति

विश्वास  पे  आधारित  होती  है

विश्वास  कारण  नहीं  ढूंढता

स्वामी : तुम  उन  प्राणियों  की  तरह  हो  जो  स्वप्न  में  ही  रहना  चाहते  है ….

किन्तु  ये  जान  ले  कन्या ..

नींद  खुलती  है  एक  दिन …

सत्य  जानना  पड़ता  है

अंतर  दिख जाता  है

फिर  पश्च्याताप के सिवा कुछ न कर पायेगी ..

कन्या : मेरा   सत्य  उस  स्वप्न  की  भाँती  है  जिस  में  मुझे  पता है की यह सत्य है, मैं अपना  स्वप्न रच  रही  हूँ …क्यूंकि  अभी  यह  सोने  की  अवस्था  है ..

मैं  जानती  हूँ  की  यह स्वप्न  है

मगर  अभी  आनंद  आ  रहा  है  इस  स्वप्न  में

यह  अवस्था  बिकुल  उसी  भाँती  है  जिस  भांति  हम  स्वप्न  में  ही  जानते  हैं  की  हम  स्वप्न में  हैं

स्वामी : तुम्हे आनंद में आनद इसलिए आ रहा है क्युकी तुने  परमानन्द  का  सुख  नहीं  लिया …

एक  बार  परमानंद  का  सुख  ले के देख, आनंद को भूल जायेगी…

परमानन्द आनद का advance version है कन्या

क्यों  इन  क्षणिक pleasure  में पड़ी  है ;

नींद  से  जाग …

सही  मार्ग  को  पहचान

उठ…wake up.

कन्या : प्रभु  में  नींद  में  हूँ  ही  कहाँ… नींद में  होती  तो  यह  ज्ञान  कहाँ  होता  की  यह  स्वप्न  है . जब  हम  वाकई  नींद  में  होते  हैं  तो स्वप्न का ज्ञान  कहाँ  होता है?

स्वामी : हेहे …मुर्खता  की  एक  और  बात  की  तुने

कन्या : तो  अपनी  बुद्धि  का  परिचय  दीजिये  प्रभु

स्वामी : तू  मुझे  अपनी  बुद्धि  का  परिचय  देने  के  लिए  नहीं  कह  रही  है  कन्या …..

अपितु  बीन  बजाने  के  लिए  कह  रही  है ..

तू  अपने  क्षणिक  सुख  में  लिप्त  है. तुझे  और  कुछ  नहीं  दिख  रहा. ना ही तू देखना चाहती है.

कन्या : बुद्धि से  इश्वर  को  नहीं  पाया  जाता  प्रभु …बुद्धि  तर्क  है …और  तर्क  इश्वर  से  नहीं  मिलता  ,,दूरी  बढा देता है ,विश्वास  से  वहां  पहुंचा  जा  सकता  है

स्वामी : बहुत  सही

कन्या : प्रेम  का  मार्ग  छोटा  है ,में  छोटे  रस्ते  पे  हूँ

स्वामी : तू  गलत  रास्ते पे है.

कन्या : तर्क  दूर  करता  है  और  जब  तक  ज्ञान  मिलता है तब  हर तर्क खुद ही हार  जाता है.

स्वामी : गलत  और  आसान होता है छोटा  मार्ग .

कन्या : कौन  सही  है  और  कौन  ग़लत  मार्ग  पे  यह  तो  मंजिल  को  पाने  वाला  ही  बता  सकता  है  स्वामी

स्वामी :  तू  बहला  रही  है

फुसला  रही  है

मुझे

अपने  आपको

कन्या : नहीं  प्रभु

मेरी  बुद्धि ….

स्वामी : कम  है

कन्या : नहीं…..इतनी  तार्किक  है की मेरे मन को फुसलने  नहीं देती  है

स्वामी : हाहाहा…

कन्या :बस विश्वास  ही  इतना  मज़बूत  है  की  बुद्धि  को वश  में  रखता  है

स्वामी :यही  तार्किक बुद्धि तो तुझे सत्य से दूर लिए हुए है

तेरे  ही कहने के हिसाब  से

कन्या : उस  बुद्धि  का  तो  अतं  कर चुकी हूँ प्रभु तभी  तो  केवल  विश्वास और प्रेम से पा न चाहती हूँ इश्वर को

स्वामी : कोई  एक  बात  कर  कन्या…Confuse मत कर 

कन्या : मेरे  अंदर  कोई  confusion नहीं  है  प्रभु

स्वामी : confusion तेरे  अंदर  नहीं …तू  स्वयं  है

कन्या : जिस  जगह  पे  खड़े  हो  कर  आप  तर्क  कर  रहे  हैं

वहां  से  में  हो  आई  हूँ

स्वामी : हाहाहा

यहाँ  से  तू  हो  आई  है ?

तू  सत्य  से  हो  आई  है ?

वापस  असत्य  में ?

कन्या : वो  सत्य  नहीं  है जो आप कह  रहे  हैं …

स्वामी :च!! च!!च!!

कन्या : और वो भी सत्य नहीं है जिस पे नहीं तर्क कर रही हूँ

स्वामी : देखा प्रेम करने  का फल ……बुद्धि Confusion से भरी हुई है.

कन्या : अगर सत्य का अनुसरण  करते  तो  हमारे  बीच यह बहस  ही नहीं होती

स्वामी : ये  बहस  नहीं  है  रे …..

ये  ज्ञान  का  प्रवाह  है …जो  अपने  आप  मुझसे  निकल  रहा  है …जैसे  शिव  जी  से मदर गंगा

कन्या : स्वामी ..

स्वामी : मूर्खे

कन्या : आप  के  सहमत  हो  जाउंगी  तो  अपने  वचनों  से फ़िर जाउंगी और  अगर नहीं होंगी  तो प्रेम  की  परिभाषा  से

तो  मैं  इस  विषय  पर  क्या  हूँ

स्वामी : तू  हमेशा  दुविधा  में  रहेगी  इसी  तरह

क्युकी  प्रेम  का  मार्ग  ही  ऐसा  है

कन्या : मैं  दुविधा  में  नहीं  हूँ  स्वामी

प्रेम  में  हूँ

स्वामी : एक ही बात है…जैसे तेरा स्वप्न वाला केस है…

कन्या : नहीं  ऐसा  लग  रहा  है  की  में  स्वपन  में हूँ  और  मुझे  पता है  की यह  स्वपन  है

स्वामी : पागल  मनुष्य जो  पहली  बात  बोलता  है  वो  यही  की  वो  पागल  नहीं  है

किन्तु  हाय रे  किस्मत !!

वो  पागल  ही  होता  है …

ये  काम  डोक्टर  का  है

जैसे की मै यहाँ …

कन्या : और  आपको  लगता  है  की  आप  डॉक्टर  हैं ?

स्वामी : लगता ????

भारी अज्ञानता  में है तू तो

इलाज़  मुश्किल  है

किन्तु  असंभव  नहीं

क्युकी  तू  मेरे  पास  आई  है

मै १०० % GUARANTEE  देता हूँ अपने मरीजों  को ..

कन्या : स्वामी  में तो फिर  अनंत काल के लिए अज्ञान  और  मरीज़  होना चाहूंगी

चलिए  इसी  तरह  आपके  संपर्क में रहने का मौका मिलेगा.

और मेरे जीवन का उद्देश्य ही क्या है?

स्वामी : (मुस्कराते हुए)कन्या…..इलाज  मेरे assistant करेंगे.

स्वामी : मै अभी  उनका  नाम  पता मेल  किये  देता हूँ.

और हमारी  कोई  और  शाखा  नहीं  है ..

Payment cash  mode में ही होगा….वो क्या है की आश्रम की कार्ड मशीन खराब चल रही है.

कन्या : आप बात से फिर रहे हैं स्वामी..मैं  तो  बस  आप  ही  से  इलाज़  करवाना  चाहती  हूँ

स्वामी : hummmm

अच्छा  इलाज चाहती  हो ?

कन्या : इलाज़  चाहती  हूँ  लेकिन  ठीक  होना  नहीं

स्वामी : मुझे  पता  है …

यहि होता  है …

अज्ञानता  चीज़  ही  ऐसी  है …

तेरी  क्या  गलती  है ?

ये  प्रेम का विषाणु  ही  ऐसा  है …

कन्या : अगर  ज्ञान  को  प्राप्त  करने  का  अर्थ

अर्थ  आप  से  दूर  होना  है  तो  मैं  अज्ञानी  ही  सही

स्वामी : फॉर्म  भर  के  admission ले लो, और हां कोई  और  कन्या  है  तो  उसे  भी  ले  आओ … हमारे  worker खुश  होंगे

कन्या : फॉर्म भरने की क्या आवश्यकता है…..emergency केस  है

स्वामी :  हेहेह …

मुर्ख …डाक्टर मै हूँ ना..

कन्या : हां…

स्वामी : तो  मुझे  जानने  दे  की  क्या  emergency   है  और  क्या  नहीं …..

तू  मुझसे  ठिठोली  कर  रही है???

कन्या : नहीं स्वामी,

स्वामी  आप रुष्ट हो  रहे  हैं ?

स्वामी : नहीं  रे

तेरी  बीमारी  का  स्वरुप  देख  मै रुष्ट हो  ही  नहीं  सकता …

तेरी  क्या  गलती  है

कन्या : वो ही  तो  स्वामी

कितनी  नादाँ  हूँ  न मैं 😉

स्वामी : 🙂

तू  घबरा  मत

सब  ठीक  कर  दूंगा

बस  पेमेंट  का  देख  ले

कन्या : क्या  पेमेंट  है

स्वामी : 🙂

वैसे  तो  आसाधारण  बीमारी  है  तेरी…

मुश्किल इलाज है …

प्रेम  का virus बहुत contagious  होता  है …

हमारे  workers  भी  खतरे  में  होंगे … तो  इस  हिसाब  से  तू  लगा  ले ..

कन्या : किन्तु मुझे  तो स्वामी को बीमार करना है.

स्वामी : हा हा हा हा हा !!!!!

मेरा  तो  टीकाकरण  है  रे !!!

कन्या : यह  बिमारी  अक्सर  टीकाकरण  क  बाद  ही  हो  जाती  है

स्वामी : मरीज़  है  न  तू ???

कन्या: जी..

तो  वो  ही  रह  न ..

कन्या : बिमारी  के  symptoms मैं  झेल  रही हूँ न !

स्वामी: पिछले  २०  सालो से R&D कर रही है हमारी टीम …इसपे.

थोडा  संयम  तो  रखना  होगा  न

कन्या : सारे  खुद  मरीज़ रह  चुके  हैं

और  जाने  कितने  अपना  मुख्या  अंग  भी  खो  चुके  हैं

स्वामी : जैसे ?

तू  मष्तिष्क  की  बात  कर  रही  है  न ? तो  उसे  तो  खोना  ही  पड़ता  है ..

कन्या : नहीं  जी

अब  रहा-सहा  वो ही  केवल  रह  गया  है  उन  में 😉

ये सुनिए प्रभु,

“Man’s heart is made of glass, once crack can’t be mend, women’s heart is made of wax, even though it melts and burns so many time, but still can be reused..”

स्वामी : अच्छा!! तो यही कारण है  की  तेरे  समाज  में  एक  लड़की  कईयों से  चक्कर  चला  लेती  है ….मोम  ठीक कर कर  के!!

कन्या : नहीं ……..They never losses the ability to love.  मैं  यह  कहना  चाहती  हूँ ….

स्वामी : की  तू  मुर्ख  है

कन्या : नहीं

स्वामी : हां

कन्या : की  मैं  बहुत  प्रेम  करती  हूँ  आप  से

स्वामी : तू  मुझे veterinary का  डॉक्टर  समझती  है ?

कन्या : अब  ऐसा  क्या  किया  मैंने

स्वामी : तू  क्यों  जानवरों  जैसी  हो  गयी  है….  Uncontrolled ??

अरे  मनुष्य  का  रूप  है  तो  उसी  में  रह !

और अब बस कर…

जा के पैग बना.

कन्या : कैसे बनाऊ?

नीबू  आज भी नहीं है

Orange juice चलेगा ?

स्वामी : ये कर्मचारी भी निकम्मे हो गए है. कितनी  बार कहा की पेड़  लगाओ  आश्रम  में …

खैर ….

Orange juice है  तो …वही ले आ….

और कुटिया से वोदका भी लेती आना, सुना  है बड़ा  तेज़  है इस द्रव्य  में …

और  सुन …..

कन्या: हाँ कहिये…

स्वामी : वो रूस वाली  लाना …

वहा की कन्यायो जैस प्रताप है उसमे…

जा !

कन्या : तब  तो  बिकुल  भी  नहीं लाऊंगी स्वामी!

स्वामी : अच्छा  अच्छा ….

वहाँ के  बालको  का  भी अपना मज़ा  है

तू  ला  तो

कन्या: मुझे  किसी  और  का  मज़ा  नहीं  लेना  है मुझे तो…

स्वामी : (चिल्लाते के अपने कर्मचारियो को बुलाते हुए)….अरे इसे जल्दी से भरती कराओ कोई!!!

(और फ़िर पर्दा निचे गिरने लगता है और ज्ञान का नशा चढ़ने लगता है!!)

पटकथा  एवं  निर्देशन   : मानस  त्रिपाठी

मंच  संयोजन : wordpress.com


ये ख़याल ही है जो अज़ल से जिंदा है ……

 

तमाम हर्फ़ है कैसे मै बिठाऊ इनको,
जो मायने निकले कोई बात न बनायी जाए!! 


कहते फिरने की बंदिशें ये रहे क्यों हम पर,
बात मुद्दे से ही  ये  क्यूँ न हटा ली जाए !!


जब के तुफ़ा ने भी लड़ने का हुनर सीख लिया,
क्यूँ न कश्ती ये समंदर में उतारी जाए !!


मंजिलों तक जो पहुचने का सफ़र लम्बा हो,
आओ रास्तो को ही मंजील कि सिफ़त दी जाए!!


एक भी शक्ल मुनासिब नहीं लगती मुझको,
क्यूँ न किरदार से ही शक्ल बना दी जाए !!

Maanas